सर्कस

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ब्लॉग प्रेषक: राजीव भारद्वाज
पद/पेशा: व्यंग्यकार
प्रेषण दिनांक: 23-06-2026
उम्र: 40
पता: गढ़वा
मोबाइल नंबर: 9006726655

सर्कस

कार्तिक की उजली रात थी। आकाश में चांद कटी हुई कचौड़ी की तरह पीला और चिकना दिख रहा था। धान के खेतों से सोंधी, अलसाई महक आ रही थी। ठीक उसी समय पूरब टोली के पोखर के पास बंधे लाउडस्पीकर ने भों-भों करना शुरू किया और पूरे नौडीहा गांव की छाती धड़क उठी।

“आ गया है, आ गया है, जेमिनी इंटरनेशनल सर्कस। पूरब वाले मैदान में, जिसमें आप देखेंगे आसमान में उड़ती परी, बिना हड्डी का पहलवान, आदमखोर शेर और दुनिया का सबसे छोटा जोकर।

लाउडस्पीकर क्या गूंजा, नौडीहा गांव में जैसे भूचाल आ गया। खलिहानों में दउनी करते हाथ रुक गए, बैलों ने कान खड़े कर लिए और चूल्हे फुंकती औरतों की कजरारी आंखों में शामियाने की रंगीन बिजलियां कौंध गईं।

पूरब टोली की गोमती काकी ने जैसे ही यह घोषणा सुनी, उन्होंने हाथ का मूसल वहीं पटक दिया। काकी का इस इलाके में एकछत्र राज था। सर्कस चाहे जो आए, पहली रात का पहला शो वही देखेंगी, ताकि अगले दिन कुएं पर पानी भरते समय दूसरी औरतों के सामने अपनी आंखें नचा-नचाकर, हाथ मटकाकर कहानी सुना सकें और उनका भौकाल बना रहे।

काकी ने झटपट ओसरे में रखा पुराना संदूक खोला। फिनाइल की गोलियों की गंध मारती अपनी बत्तीस हाथ वाली ढाकेश्वरी साड़ी निकाली, जिसे वह सिर्फ शादी-ब्याह या मुंडन में पहनती थीं। आईने के सामने खड़े होकर उन्होंने माथे पर एक बड़ी सी लाल बिंदिया चिपकाई और अपनी सहेली को चिढ़ाने के लिए कजरी गुनगुनाने लगीं,

पिया गइले कलकतवा ए रामा, अइले सकरस लेके हो ना...

तभी बगल वाले ओसरे से नौडीहा वाली चंपा बुआ अपनी पतली कमर पर दोनों हाथ रखकर मटकती हुई निकलीं। चंपा बुआ गांव की चलती-फिरती आकाशवाणी थीं, साफ कहें तो चुगलखोर। कोई खबर उनसे छुपती नहीं थी और हर बात में नुक्स निकालना उनका जन्मसिद्ध अधिकार था। उन्होंने अपने मुंह का बनारसी पान एक तरफ दबाया, आंखें तरेरीं और गोमती काकी को टोंका

अरी छोड़ो भी गोमती, काहे बिना मंजीरे के नाच रही हो? पिछली बार जो अजंता सर्कस आया था, उसमें जिसे तुम साक्षात इंद्रलोक की परी कहकर पूज रही थीं, वह तो हमारे बगल वाले महुआ गांव के जगरनाथ दर्जी की भगिनी निकली, मुंह पर इतना मैदा और थूक-पाउडर पोत रखा था कि पहचान में नहीं आई। इस बार मैं खुद आगे बैठकर उसकी जात-पात जांचूंगी, तब जाकर अपनी चवन्नी ढीली करूंगी।

उधर, डीह बाबा के स्थान पर बुजुर्गों की चौपाल सजी थी। अस्सी पार के दुखरन बाबा अपनी तीन गांठ वाली लाठी टेकते हुए चिलम का सुट्टा मार रहे थे। उन्होंने अपने जीवन में पैंसठ सर्कस और न जाने कितनी नौटंकियां देख रखी थीं। उनके सामने आज का कोई भी तमाशा तुच्छ था। उन्होंने कफसते हुए कड़क आवाज में लड़कों को डांटा और पुराना निर्गुण गीत छेड़ दिया, बइठल रोवे ली गुजरिया हो, चुनरिया में दाग लग गइल.....।

बाबा हुक्का गुड़गुड़ाते हुए बोले, तुम आज के छौंडे क्या जानो सर्कस, हमारे जमाने में जब जंबो सर्कस आया था, तो साक्षात बंगाल का रॉयल बंगाल टाइगर अपनी मूंछों पर ताव देकर मैनेजर की कुर्सी पर बैठता था और मुंशी की तरह हिसाब लिखता था। आज तो सब सियार की खाल पर कत्था-चूना पोतकर भालू की तरह नचाते हैं। सब ठगविद्या है।

लेकिन बच्चों की पलटन को इस बुजुर्गवार ज्ञानबाजी से क्या मतलब? सात साल का लटूरी और दस साल का झबरू दोपहर से ही अपनी-अपनी फटी जेबों से चवन्नी-अठन्नी निकालकर गिन रहे थे। हिसाब कम पड़ा, तो दोनों ने मिलकर मां की नजर बचाई और कोठी से दो सेर नया धान चुराकर सीधे सुक्खू बनिया की दुकान पर तौल दिया। उनके लिए तो आज ही दिवाली थी, आज ही छठ।

रात के आठ बजते-बजते पूरा नौडीहा गांव जैसे खाली हो गया। क्या बूढ़े, क्या बच्चे, क्या गोरी, क्या काली, सब के सब लालटेन, पांच सेल वाली टार्च और गोदी में बच्चों को कांख तले दबाए चौर वाले मैदान की तरफ मार्च कर रहे थे।

मैदान में पहुंचते ही आंखें चौंधिया गईं। गैस की बत्तियां भक-भक जल रही थीं। हवा में भुने हुए चने, सोंधी जलेबियों और गन्ने के रस की महक तैर रही थी। सर्कस के लाउडस्पीकर पर अब कोई विरहा बज रहा था।

टिकट खिड़की पर ऐसी धक्का-मुक्की मची कि लगा जैसे कोई दंगा हो जाएगा। उसी भीड़ में गोमती काकी की कीमती ढाकेश्वरी साड़ी का आंचल चंपा बुआ के भारी-भरकम पैर के नीचे आ गया।

अरे मुई, देखकर नहीं चला जाता क्या? सर्कस देखने आई हो या मेरी नई साड़ी का कफन फाड़ने, काकी नागिन की तरह फुंफकार उठीं।

अरे तो अपनी पूंछ जैसी साड़ी संभाल कर रखो न काकी, यहां तो भीड़ के मारे खुद का पेटीकोट संभालना मुश्किल हो रहा है, तुम्हारी साड़ी कौन चुराए, चंपा बुआ ने भी मुंह मटकाकर करारा जवाब दिया।

जैसे-तैसे सब भीतर घुसे। भीतर का नजारा अद्भुत था। चारों तरफ बांस के ऊंचे-ऊंचे मचान बने थे, जिन पर लोग ऐसे लदे थे जैसे बरसात के दिनों में जामुन के पेड़ पर चमगादड़ लटकते हैं। जैसे ही शामियाने की बड़ी बत्तियां बुझीं और चारों तरफ नीली-हरी रोशनियां चक्रव्यूह की तरह घूमने लगीं, गांव की नई-नवेली बहुओं के झुंड से धीमी आवाज में सोहर की तर्ज पर ठिठोली फूट पड़ी।

पिट-पिट-पिट-पिट-धुम्म, ड्रम बजा और रिंगमास्टर ने अपनी हंटर हवा में लहराई—छटाक!

 आसमान की परी, सबसे पहले चमकीली पोशाक पहने एक लड़की, जिसके बदन पर बिजली के बल्ब टिमटिमा रहे थे, रस्सी के सहारे हवा में उड़ी। उसने दांतों से रस्सी पकड़ी और गोल-गोल घूमने लगी। गोमती काकी ने झट से अपने दांतों तले उंगली दबा ली, हे गंगा मैया, ई तो साक्षात मानुष नहीं, कोई देवी है! बिना पंख के कौए की तरह उड़ रही है। चंपा बुआ ने अपनी आंखें सिकोड़कर कहा, अरे धत्, ऊपर देखो, लोहे का मोटा तार बंधा है। पैर फिसला नहीं कि सीधे यमराज के बही-खाते में नाम दर्ज, और उसको देख के रामेसर बाबा बोले, ससुरी बियाह से पहले काहे नहीं दिखी, एकाध बीघा बेचना पड़ता तो बेच देते लेकिन बियाह इसी से करते।

 मौत का कुंआ, इसके बाद जब लोहे के विशाल पिंजरे में दो कड़कड़ाती, धुआं उड़ाती मोटरसाइकिलें दीवारों पर समानांतर दौड़ने लगीं, तो दुखरन बाबा की चिलम उनके हाथ से छूटकर नीचे गिर गई। बाबा अपनी लाठी भूलकर मचान पर ही खड़े हो गए। पूरा पंडाल 'हुर्र-हुर्र! हईशा!' के गगनभेदी नारों से गूंज उठा।

लेकिन असली तमाशा तब शुरू हुआ, जब मैदान में झिंगनू जोकर की एंट्री हुई।

झिंगनू का मुंह आधा लाल, आधा सफेद रंगा था। नाक पर प्लास्टिक का पका हुआ लाल टमाटर था और उसकी पतलून इतनी ढीली थी कि वह उसे बार-बार दोनों हाथों से ऊपर खींचता, फिर भी वह सरक कर नीचे गिर जाती थी। वह कमर मटकाते हुए भोजपुरी की फगुआ शैली में जोर-जोर से गाने लगा, बुढ़वा भी नाचे, लइका भी नाचे, नाचे सकरस के जोकरवा...

अरे, देखि-देखि हंसे नौडीहा के लोगवा और गाते गाते वो रामेसर काका के मंच पर पकड़ के ले आया, वहां खड़ा जादूगर उनकर सामान गायब कर दिया, बस फिर क्या था, लगे रामेसर काका गरियाने। पंडाल में हंसी का फव्वारा छूट गया। झिंगनू अपने साथ एक छोटा सा सफेद कुत्ता लेकर आया था, जो कोट-पतलून पहने हुए इंसानों की तरह दो पैरों पर चल रहा था।

जोकर ने हाथ में एक बड़ा सा नकली गुलाब का फूल लिया और जोर से चिल्लाया श्रोताओं, भाइयों और उनकी बहनों, यह कुत्ता मामूली नहीं है, यह विलायत से बी.ए. पास करके आया है! इस पूरे पंडाल में जो सबसे रूपवती, सबसे सुशील और साक्षात अप्सरा जैसी महिला होगी, यह कुत्ता यह फूल सीधे जाकर उनके चरणों में समर्पित कर देगा, यह सुनते ही पूरे पंडाल में मानो सांप सूंघ गया। जितनी भी औरतें थीं, सबने लज्जा और डर के मारे अपने-अपने घूंघट दो-दो हाथ लंबे काढ़ लिए। गोमती काकी ने भी अपनी ढाकेश्वरी साड़ी का पल्लू चेहरे पर लपेट लिया। वह मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ने लगीं कि 'हे बजरंगबली, इसका मति फेर देना, कहीं यह फूल मेरे आगे न फेंक दे, नहीं तो यह चंपा चुड़ैल पूरे गांव के कुएं पर मेरी थू-थू करवा देगी।

कुत्ता अपनी दुम हिलाता हुआ, दर्शकों की कतार के पास आया। उसने सूंघना शुरू किया। वह आगे बढ़ा... और आगे बढ़ा... और ठीक उस जगह जाकर रुक गया जहां चंपा बुआ घूंघट के भीतर से एक आंख खोलकर उसे ताक रही थीं।

कुत्ते ने एक बार भौं किया, अपने दोनों अगले पैर उठाए और वह बड़ा सा गुलाब का फूल सीधे जाकर चंपा बुआ की गोद में गिरा दिया!

अरे मैया गे, ई का रे, चंपा बुआ हड़बड़ा कर मचान पर खड़ी हो गईं। उनकी पांच सेल वाली टार्च हाथ से छूटकर नीचे गिर गई।

पूरे नौडीहा गांव के लोग पेट पकड़-पकड़कर हंसने लगे। हंसी के मारे लटूरी मचान से नीचे गिरते-गिरते बचा।

गोमती काकी ने इस जीवन के सबसे बड़े मौके को हाथ से नहीं जाने दिया। उन्होंने घूंघट हटाया, जोर से ताली पीटी और चंपा बुआ के कंधे पर हाथ मारकर बोलीं लो बुआ! तुम तो कह रही थीं कि सब ठगविद्या है, अब बोलो, तुम्हारी विश्वसुंदरी होने का प्रामाणिक सर्टिफिकेट तो साक्षात विलायत के पढ़े-लिखे कुत्ते ने सरेआम दे दिया, अब शरमाओ मत बुआ, निकालो अपनी पोटली से एक अठन्नी और इस बेचारे जोकर को इनाम दो,

चंपा बुआ का चेहरा गुस्से और शर्म के मारे बिल्कुल लाल-बैंगन हो गया था। उन्होंने जोकर को अपनी लाठी दिखाते हुए घूरकर कहा, चल हट छौंडे, बुढ़ापे में मेरी हंसी उड़ाता है? भाग यहां से, नहीं तो यही लाठी से तेरी टमाटर जैसी नाक पिचक दूंगी!

लेकिन डांटने के बावजूद, चंपा बुआ के होठों के कोने में एक ऐसी छुपी हुई, रसीली मुस्कान तैर गई, जिसे गैस की तेज रोशनी ने पकड़ लिया था। उन्होंने चुपके से उस गुलाब के फूल को अपनी साड़ी के खोंचे में छुपा लिया।

रात के बारह बजे सर्कस का आखिरी ड्रम बजा। तमाशा खत्म हुआ।

शामियाने की बत्तियां एक-एक कर बुझने लगीं। कार्तिक की ठंडी, कनकनी हवा चलने लगी थी। बच्चे अपने पिपरमिंट चूसते-चूसते पिताओं के कंधों पर ही सो चुके थे। दुखरन बाबा अपनी लाठी टेकते हुए आगे-आगे चल रहे थे और अब वह भी दबी जुबान से मान रहे थे कि चोर की मोटरसाइकिल वाले खेल में कलेजा चाहिए भाई।

लौटते वक्त नौडीहा गांव की पगडंडी पर गोमती काकी और चंपा बुआ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही थीं। दोनों के बीच की सदियों पुरानी खटास सर्कस के ठहाकों में बहकर चौर के मैदान में ही छूट गई थी।

रास्ते के सन्नाटे और झींगुरों की आवाज को चीरते हुए चंपा बुआ ने अपनी खनकती, भारी आवाज में जंतसार (जांत पीसते समय गाया जाने वाला विरह गीत) के सुर में विदाई की तान छेड़ी,

सकरस के मेला उजड़ गइले रामा...

गीत के सुर हवा में तैर रहे थे। गोमती काकी ने हंसते हुए अपनी पोटली खोली, एक मीठा जर्दा वाला पान निकाला और चंपा बुआ के मुंह में ठूंसते हुए बोलीं, लो बुआ, अब मुंह बंद करो और पान चबाओ। जोकर तो खैर पागल था ही... पर वह जो लड़की रस्सी पर बिना डरे नाच रही थी, सच कहती हूं बुआ, उसकी आंखें हुबहू तुम्हारी जवानी के दिनों जैसी कजरारी और चंचल थीं।

चंपा बुआ ने पान चबाते हुए आसमान के चांद को देखा। नौडीहा गांव की पगडंडी पर दूर तक लालटेनों की कतार ढुलमुल-ढुलमुल डोल रही थी, मानो पूरा गांव ही कोई जीवंत, रंग-बिरंगा सर्कस हो, जिसका शो इस माटी पर कभी खत्म नहीं होता।

और आज जब उस वक्त को सोचता हूं तो लगता है "कहवां गइल लरीकईयां हों, जरा हमके बता द"।

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