| ब्लॉग प्रेषक: | राजीव भारद्वाज |
| पद/पेशा: | व्यंग्यकार |
| प्रेषण दिनांक: | 10-06-2026 |
| उम्र: | 40 |
| पता: | गढ़वा |
| मोबाइल नंबर: | 9006726655 |
एक सफर -सौ तमाशे
एक सफर - सौ तमाशे
मैं समय हूँ...
रेलवे स्टेशन में लगे घड़ी का समय। आप मेरे समय को देख कर रेल के टाइम से आने का समय न मिलाए और न ही अपनी घड़ी को मिलाएं, मै रेलवे का समय हूं। मैंने राजाओं का उत्थान-पतन देखा है, साम्राज्यों को बनते-बिगड़ते देखा है, किंतु जो दृश्य मैंने भारतीय रेल में देखा, वैसा न कुरुक्षेत्र में देखा, न हस्तिनापुर में, न अयोध्या में देखा और न ही रावण के लंका में।
उस पवन दिन मैं रेलयात्रा हेतु स्टेशन पहुँचा। स्टेशन पर जनसमूह ऐसा उमड़ा हुआ था मानो समस्त आर्यावर्त/जम्बूदीप को एक ही ट्रेन से स्वर्गलोक जाना हो। लाउडस्पीकर से आकाशवाणी हुई—
यात्रीगण कृपया ध्यान दें...किन्तु यात्रीगण ध्यान दें कैसे? वे तो पहले ही अपनी-अपनी गठरियों, बच्चों, टिफिनों और भविष्य की चिंताओं पर ध्यान दिए हुए थे। घोषणा हुई कि गाड़ी दो घंटे विलंब से आएगी। यात्रियों ने इसे ऐसे स्वीकार किया जैसे प्रजा समय समय पर होने वाली डीजल, गैस और पेट्रोल वृद्धि को स्वीकार करती है, दुखी होकर, विवश होकर।
तभी एक वृद्ध यात्री बोले, हे वत्स! यह तो कुछ भी नहीं। हमने ऐसी रेलें भी देखी हैं जो अगले दिन आई थीं और स्वयं को समय पर मान रही थीं। सभी श्रद्धा से उनका मुख देखने लगे। वे रेलवे पुराण के जीवित ऋषि प्रतीत हो रहे थे। मुझे तो साक्षात् अश्वत्थामा प्रतीत हुए। कुछ समय पश्चात रेल का आगमन हुआ। और फिर प्रारंभ हुआ सीट-युद्ध पर्व का अध्याय जो महाभारत के युद्ध पर्व जैसा लगा।
जो बाहर निकलना चाहते थे, वे भीतर घुस रहे थे। जो भीतर जाना चाहते थे, वे बाहर आ रहे थे। स्थिति ऐसी थी कि स्वयं श्रीकृष्ण भी सारथी बनने से पहले दो बार विचार करते। और पुनः वृंदावन जाकर राधा के साथ मस्त हो जाते। किसी प्रकार हम घसटाते घसटाते अपनी आरक्षित सीट तक पहुंचे। किन्तु वहाँ एक महापुरुष दुर्योधन की तरह सीट को हस्तिनापुर समझ कर विराजमान थे। मैंने कहा
महोदय, यह सीट मेरी है। उन्होंने टिकट की ओर वैसे देखा जैसे युधिष्ठिर के द्वारा पांच गांव मांगने पर दुर्योधन ने उन्हें देखा था।
वे बोले— टिकट तुम्हारा हो सकता है, परंतु बैठेंगे हम। और जाओ कहीं यदि इंद्रप्रस्थ दिखे तो तशरीफ टिका लो।
मैंने टीटीई को खोजने का प्रयास किया, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार पांडव ने खोजना प्रारंभ किया था श्रीकृष्ण को।
परंतु टीटीई ऐसे अदृश्य थे जैसे चुनाव के बाद क्षेत्र से नेता।
काफी खोजबीन के बाद उनका दर्शन हुआ।
मैंने अपनी व्यथा सुनाई। वे बोले—
चिंता मत करो वत्स, व्यवस्था हो जाएगी।
यह सुनकर मुझे लगा कि अब न्याय अवश्य मिलेगा। किन्तु व्यवस्था यह हुई कि उन्होंने दूसरे यात्री से कहा थोड़ा खिसक जाइए। और मुझे सीट का एक कोना प्रदान कर दिया गया।
इतिहास में इसे "आधा राज्य समझौता" कहा जाएगा। तभी चायवाले का प्रवेश हुआ। चाय... चाय... गरम चाय...
उसकी गर्जना इतनी प्रचंड थी कि यदि वह कुरुक्षेत्र में होता तो शंखनाद की आवश्यकता समाप्त हो जाती।
उसके पीछे समोसे वाला, मूँगफली वाला, पानी वाला, खिलौना वाला और चादर वाला आए।
बगल में बैठे थे तारकेश्वर बाबू, एक अंडा बिरयानी का ऑर्डर दिए। अंडा बिरयानी आया 120 रुपए का। तारकेश्वर बाबू आपन पॉकेट में हाथ डाले और एक मरा हुआ कोकरोच निकलें, उसे अंडा बिरयानी के अंदर प्रेम से छुपाए। हम ई सब करते उनको देखे, तो वो हमरा आंख मारे और बोले, चुप रहिएगा हो गया रास्ते भर खाने का फ्री इंतजाम। फिर उसका प्रेम से वीडियो बनाए और 139 नंबर पर शिकायत किए कि अंडा बिरयानी की जगह हमको परोसा गया कोकरोच बिरयानी। मेरी हत्या की साजिश रची जा रही है। बस फिर क्या था, ट्रेन मैनेजर और उसकी पूरी टोली तारकेश्वर बाबू के कदमों में माफी मांगते नजर आया। ई सब देख के हम भी तारकेश्वर बाबू के साथ हो लिए। अब हर पांच मिनट बाद कॉफी, बिस्कुट और चाइनीज चिल्ली। पूरा भीम के अवतार में थे हम और तारकेश्वर बाबू।
ऐसा प्रतीत हो रहा था तारकेश्वर बाबू का पूरा अर्थतंत्र इसी अनुभव पर आधारित था।
बगल ने पता नहीं केकर रेंगा रो रहा था।नहीं महाराज, यह कहना अनुचित होगा कि वह रो रहा था।
वह अपनी स्वर-शक्ति से सम्पूर्ण ब्रह्मांड को कंपित कर रहा था।
उसकी ध्वनि सुनकर मुझे लगा कि शायद घटोत्कच पुनः जन्म ले चुका है। रात्रि हुई। ऊपरी बर्थ वाला यात्री नीचे आ गया। निचली बर्थ वाला ऊपर चला गया। मध्य बर्थ वाला कहीं और सो गया। और जिनके पास सीट नहीं थी, वे सबके ऊपर सो गए। भारतीय रेल में गुरुत्वाकर्षण का नियम भी लोकतांत्रिक हो जाता है। इससे भारतीयों में कितना प्रेम है, सहज समझा जा सकता है।
मेरे डिब्बे में एक महाशय चढ़े, जिनका नाम था घोषणा प्रसाद। उनकी विशेषता यह थी कि वे हर पाँच मिनट पर ऐसी घोषणा करते जैसे रेल मंत्री हों। "यात्रिगण कृपया ध्यान दें, चाय वाला आने वाला है!", "यात्रिगण कृपया ध्यान दें, मेरी पत्नी का फोन आने वाला है!"। एक स्टेशन पर वे इतने उत्साह में उतरकर दूसरों को चढ़ाने लगे कि ट्रेन चल दी और वे प्लेटफॉर्म पर ही रह गए। दौड़ते हुए चिल्लाए—यात्रिगण कृपया ध्यान दें, असली यात्री नीचे रह गया है।
और तो और कुछ नीमोछिया हाफ पैंट और टी शर्ट पहन कर। ट्रेन के हर बोगी को ऐसा स्कैन करता जैसे हर सवारी में अपना बाप खोज रहा हो, अगर कोई लड़की या भौजी दिख जाती तो ऐसे चलता जैसे रैंप पर कोई मॉडल चलती है।
भले ही बोगी ऐसी वाला हो लेकिन गेट के पास अनावश्यक खड़ा रहने वाला भी कई शिखंडी मुझे देखने को मिले, जो शौचालय आती जाती महिलाओं के लिए शौचालय का जाम पड़ा गेट खोलने की कोशिश करने का पुण्य काम करने के लिए ही रेल यात्रा करते हैं।
और तो और कोणार्क और खजुराहो की कलाकृति भी इन्हीं महापुरुष द्वारा शौचालय के दीवार पर उकेरने का पावन कार्य किया जाता रहा है। हर शौचालय में आपको वैसा नंबर लिखा मिल जाएगा जो अमूमन एक महिला का होता है, संभवतः वो इनकी भूतपूर्व प्रेमिका रही होगीं, जिनकी याद में इस प्रकार का शिलालेख इनके द्वारा लिखा जाता है।
सफर में ही एक सज्जन बड़े गर्व से बोले, “देश को स्वच्छ रखना हम सबका कर्तव्य है!” इतना कहकर उन्होंने मूंगफली खाई और छिलके सीधे फर्श पर बिखेर दिए। दूसरे यात्री ने समर्थन में सिर हिलाया और पानी की खाली बोतल खिड़की से बाहर फेंक दी। तभी तीसरे महाशय उठे और स्वच्छता पर लंबा भाषण देते हुए पान की पीक दरवाजे के पास उकेर गए। पूरा डिब्बा स्वच्छ भारत का ब्रांड एंबेसडर बना हुआ था, बस एक छोटी-सी समस्या थी—सबके भाषण चमक रहे थे, लेकिन रेल का फर्श कूड़े से आत्मनिर्भर बन चुका था!
रात के बारह बजते ही एसी कोच का दृश्य किसी रहस्य-रोमांच फिल्म जैसा हो गया। सभी यात्री सफेद बेडशीट सिर से पैर तक ओढ़कर ऐसे लेटे थे मानो सामूहिक भूत सम्मेलन चल रहा हो। एक नया यात्री नींद से जागा, चारों ओर नज़र दौड़ाई और घबरा गया। उसे लगा कि कहीं गलती से श्मशान एक्सप्रेस में तो नहीं चढ़ गया! ऊपर वाली बर्थ से किसी के खर्राटे गूंजे तो ऐसा लगा जैसे कोई प्रेतात्मा उद्घोषणा कर रही हो। तभी टीटी आया, टिकट देखा और बोला, डरिए मत साहब, ये भारतीय रेल है, भूत नहीं, यात्री हैं!
एसी कोच में अटेंडेंट की हालत किसी शांति वार्ता कराने वाले दूत जैसी थी। सीट नंबर 21 वाले बोले, भाई, ठंड से हाथ सुन्न हो रहे हैं, एसी कम करो।तभी सीट 35 से आवाज आई, “कम किया तो हम पिघल जाएंगे, एसी बढ़ाओ! एक यात्री कंबल ओढ़कर कांप रहा था, तो दूसरा बनियान में गर्मी का लोकगीत गा रहा था। अटेंडेंट हर पाँच मिनट में तापमान बदलता और दोनों पक्ष उसे घूरते। आखिर परेशान होकर बोला, आइए सिखा देते हैं कम बेसी करना।
उधर, तारकेश्वर बाबू मुफ्त का ठूंस ठूंस कर बड़े आराम से अपनी बर्थ पर सोए। उनका स्टेशन रात में आकर चला भी गया, लेकिन उनकी नींद ऐसी थी मानो कुंभकर्ण ने उन्हें व्यक्तिगत प्रशिक्षण दिया हो। सुबह आँख खुली तो खिड़की के बाहर का नज़ारा अनजान था। घबराकर सहयात्री से पूछा, भाई साहब, मेरा स्टेशन कब आएगा? जवाब मिला, “वह तो दो सौ किलोमीटर पहले आकर चला गया! तारकेश्वर बाबू का चेहरा ऐसा हो गया जैसे शेयर बाजार में पूरी पूंजी डूब गई हो। तभी टीटी प्रकट हुए। तारकेश्वर बाबू ने दया की उम्मीद से कहा, “साहब, नींद लग गई थी।” टीटी मुस्कुराए, रेलवे आपकी नींद का सम्मान करता है, लेकिन दूरी का किराया भी लेता है। फिर अतिरिक्त किराया और जुर्माना वसूला गया। बेचारे तारकेश्वर बाबू को तब समझ आया कि भारतीय रेल में सोना मुफ्त है, लेकिन ज़्यादा सोना बहुत महंगा पड़ सकता है! और मुफ्त का माल भी बड़ा बेरहम होता है।
रेल में एक महाशय को अपने सामान की ऐसी चिंता थी मानो वे हीरे-जवाहरात लेकर चल रहे हों। रात होते ही पूरे डिब्बे ने कंबल ओढ़कर नींद का आनंद लिया, लेकिन वे चौकन्ने होकर बैग पर हाथ रखे बैठे रहे। हर गुजरने वाले यात्री को शक की नज़र से देखते, कभी चेन टटोलते तो कभी ताला जांचते। रात भर उन्होंने स्वयं को रेलवे सुरक्षा बल का मानद सदस्य समझकर चौकीदारी की। सुबह जब स्टेशन आया तो पता चला कि उनका बैग तो सुरक्षित था, लेकिन मोबाइल, चश्मा और टिकट उन्होंने खुद ही तकिए के नीचे दबाकर भूल गए थे। पूरी रात चोर नहीं आया, पर नींद जरूर चोरी हो गई!
प्रातःकाल शौचालय जाने का विचार आया। किन्तु वहाँ पहुँचकर ज्ञात हुआ कि यह स्थान मनुष्य के अहंकार को तोड़ने के लिए निर्मित किया गया है। यदि इसके दुर्गंध को बर्दाश्त कर आप वहां पांच मिनट भी समय व्यतीत कर लेते हैं तो समझिए मोक्ष के काफी निकट हैं और बुद्धत्व की प्राप्ति होने ही वाली है। वहाँ से लौटकर मैं आध्यात्मिक रूप से अधिक परिपक्व हो चुका था और मुंह से निरंतर राम राम निकल रहा था। और मन कह रहा था, हे प्रभु यदि यह यात्रा सफलतापूर्वक पूर्ण हो गई , तो अब जीवन में कोई भी चुनौती बड़ी नहीं रहेगी।
मैं समय हूँ...और मैं साक्षी हूँ कि भारतीय रेल में यात्रा करने वाला प्रत्येक यात्री कुछ घंटों के लिए साधारण मनुष्य नहीं रहता। वह योद्धा बन जाता है।
रेल यात्रा में कुछ यात्री ऐसे होते हैं जो टिकट से ज्यादा अपने सपनों की यात्रा करते हैं। एक महाशय खिड़की के पास बैठे जीवन, प्रेम और भविष्य पर गहन चिंतन कर रहे थे। तभी ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी और प्लेटफॉर्म पर खड़ी एक युवती को विदा करने पूरा परिवार उमड़ पड़ा।
दृश्य बिल्कुल फिल्मी था। पिता की आँखें नम, रिश्तेदार भावुक और युवती ट्रेन में चढ़ने को तैयार। तभी परिवार के एक बुज़ुर्ग ने दोनों हाथ फैलाकर अमरीश पुरी की शैली में कहा, “जा बेटी... जी ले अपनी ज़िंदगी!”
युवती तो ट्रेन में चढ़ गई, लेकिन पास खड़े एक यात्री ने यह सुनते ही अपना बैग उठा लिया। लोगों ने पूछा, “कहाँ जा रहे हैं?”
बोला, “जब जीने की खुली छूट मिल गई है, तो ट्राई करने में क्या हर्ज है!”
ट्रेन सीटी देकर चल पड़ी। और हम भी पटरियों को पीछे छूटते देखते जा रहे थे।
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