विक्षिप्त हमारी संवेदना।

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ब्लॉग प्रेषक: राजीव भारद्वाज
पद/पेशा: व्यंग्यकार
प्रेषण दिनांक: 18-06-2026
उम्र: 40
पता: गढ़वा
मोबाइल नंबर: 9006726655

विक्षिप्त हमारी संवेदना।

गर्मी की एक चिलचिलाती सुबह थी। मैं रोज़ की तरह मोहल्ले की चाय की दुकान पर खड़ा चाय की चुस्कियाँ ले रहा था। दुकान पर लोगों की भीड़ थी, राजनीति पर बहस चल रही थी और हर कोई अपने-अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने में व्यस्त था। तभी फटे-पुराने कपड़ों में एक विक्षिप्त व्यक्ति वहाँ आकर खड़ा हो गया। बिखरे बाल, धूल से सना चेहरा और आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी। उसे देखकर कुछ लोग मुस्कुरा दिए, कुछ ने उपेक्षा से मुँह फेर लिया। वह धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ा। बाबू... एक बिस्किट दिला दीजिए... उसकी आवाज़ में याचना थी, लेकिन वह भीख माँगने वालों जैसी नहीं थी। जैसे कोई अपनी अंतिम उम्मीद लेकर खड़ा हो।

मैं कुछ सोच पाता, उससे पहले आसपास बैठे लोग बोल पड़े—

अरे साहब, मत दिलाइए। रोज़ की आदत है इसकी। पागल है पूरा।

एक बार खिलाइएगा, फिर रोज़ सिर पर चढ़ जाएगा। उनकी बातें सुनकर मैं कुछ क्षण के लिए ठिठक गया। फिर न जाने क्यों जेब से पैसे निकाले और दुकान वाले से एक पैकेट बिस्किट देने को कहा।

उस व्यक्ति ने बिस्किट लिया। उसकी आँखों में एक पल के लिए चमक उभरी। मैंने सोचा, शायद वह कई दिनों से भूखा होगा और अब किसी कोने में बैठकर तुरंत खा जाएगा।

लेकिन उसने पैकेट खोला भी नहीं।

वह बिना कुछ कहे आगे बढ़ गया। जिज्ञासावश मेरी नज़र उसका पीछा करने लगी। दुकान से थोड़ी दूर सड़क किनारे नाली के पास तीन छोटे-छोटे कुत्ते के बच्चे दुबके हुए थे। उनकी पसलियाँ साफ़ दिखाई दे रही थीं। भरी गर्मी में वे मासूम शायद कई दिनों से भूखे थे। वह तथाकथित "पागल" उनके पास बैठ गया।

बहुत सावधानी से उसने बिस्किट का पैकेट खोला। फिर एक-एक बिस्किट तोड़कर उन बच्चों के सामने रखने लगा। कुत्ते के वे बच्चे टूट पड़े। उनकी आँखों में भूख थी, और उस आदमी की आँखों में संतोष।

वह स्वयं एक टुकड़ा भी नहीं खा रहा था।

बस उन्हें खाते हुए देख रहा था।

उस क्षण चाय की दुकान का शोर मेरे कानों से गायब हो गया।

मैं स्तब्ध खड़ा था।

जिस व्यक्ति को हम सब पागल समझ रहे थे, वह अपनी भूख से पहले किसी और की भूख को देख रहा था। और हम, जो स्वयं को समझदार, शिक्षित और सभ्य कहते हैं, उसे एक बिस्किट का पैकेट देने से पहले सौ तर्क खोज रहे थे।

मेरी आँखें नम हो गईं।

वह व्यक्ति धीरे-धीरे उठकर चला गया। पीछे रह गए वे तीन तृप्त पिल्ले और मेरे भीतर उठता एक प्रश्न—पागल कौन था? वह, जो अपनी भूख भूलकर भूखे जीवों को खिला गया...

या हम, जो इंसान होकर भी करुणा का अर्थ भूल चुके हैं?

उस दिन चाय का स्वाद फीका था, लेकिन जीवन का एक बहुत बड़ा सच मेरे भीतर उतर चुका था।

कभी-कभी सड़क पर भटकते हुए लोग विक्षिप्त नहीं होते।

विक्षिप्त तो शायद हमारी संवेदनाएँ हो चुकी होती हैं।

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