| ब्लॉग प्रेषक: | राजीव भारद्वाज |
| पद/पेशा: | व्यंग्यकार |
| प्रेषण दिनांक: | 09-06-2026 |
| उम्र: | 40 |
| पता: | गढ़वा |
| मोबाइल नंबर: | 9006726655 |
नियुक्ति पत्र का महाभारत।
नियुक्ति पत्र का महाभारत।
हमारे यहां शिक्षक की नियुक्ति अब नौकरी नहीं रही, यह तपस्या बन चुका है। पहले ऋषि-मुनि जंगल में बैठकर भगवान को प्रसन्न करते थे, आज अभ्यर्थी साइबर कैफे, कोचिंग और कोर्ट-कचहरी के बीच बैठकर नियुक्ति पत्र क
के लिए आयोग को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि भगवान तो कभी-कभी प्रकट भी हो जाते हैं, लेकिन नियुक्ति पत्र नहीं।
इस बार शिक्षक नियुक्ति का परिणाम आया तो गांव में ऐसा माहौल बना जैसे बरसों बाद पोखरे में पानी आया हो। जिनका नाम सूची में दिख गया, उनके घर वाले ऐसे खुशी मना रहे थे जैसे लड़का सीधे आईएएस बन गया हो। लेकिन जब सूची को ध्यान से देखा गया तो कई ऐसे वीर योद्धा निकले जिनकी स्थिति थी—आज नियुक्ति, कल सेवानिवृत्ति।
सरकार शायद अनुभव को बहुत महत्व देती है। इसलिए तारकेसर चा जिनकी कमर झुक चुकी है, जिनके घुटने सीढ़ी देखकर राष्ट्रगान गाने लगते हैं, उन्हें अब बच्चों को दौड़कर पकड़ने, उसका नाक पोछने और ब्लैकबोर्ड पर चाक घिसने भेजा जा रहा है। लगता है शिक्षा विभाग का मानना है कि जवान शिक्षक पढ़ाएंगे तो सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा होगा, बूढ़े शिक्षक पढ़ाएंगे तो जीवन-दर्शन भी मिलेगा।
कुछ लोगों को नियुक्ति पत्र ऐसा मिला जैसे सत्तर साल के बुजुर्ग को बारात में नाचने का निमंत्रण मिल गया हो। खुशी तो हुई, लेकिन शरीर ने धीरे से कहा—"बाबू, अब नौकरी नहीं, तुलसी चौरा संभालने की उम्र है।"
सबसे भावुक दृश्य तो तब दिखा जब एक अभ्यर्थी को मरणोपरांत नियुक्ति पत्र मिला। जीवन भर नौकरी का इंतजार किया। नौकरी भी शायद शर्मीली प्रेमिका निकली। जब तक आदमी जिंदा रहा तब तक सामने नहीं आई, और जब दुनिया छोड़कर चला गया तब घर का पता पूछती हुई पहुंच गई। लगता है नियुक्ति पत्र और अभ्यर्थी की प्रेम कहानी किसी भोजपुरी फिल्म की तरह थी—मिलना दोनों को था, लेकिन इंटरवल के बाद।
जिनकी नियुक्ति हुई, उनकी हालत भी कोई बहुत सुखद नहीं है। आठ महीने से मानदेय नहीं मिला। विद्यालय में बच्चों को आत्मनिर्भर भारत पढ़ा रहे हैं और स्वयं सरकारी राशन दुकान पर 30 रुपए उधार के भरोसे आत्मनिर्भर बने हुए हैं।
बच्चों से कहते हैं—बेटा, मेहनत करो, आगे बढ़ो।
और शाम को राशन डीलर से कहते हैं—"भइया, इस बार भी खाते में लिख दीजिए।"
अब हमरा बात, साला
मेरा प्रमाण-पत्र सत्यापन हो गया।
सत्यापन क्या हुआ, पूरे खानदान ने मुझे शिक्षा मंत्री घोषित कर दिया। रिश्तेदारों ने फोन करना शुरू कर दिया। गांव के लोग मिलने लगे। जिन लोगों ने वर्षों से हालचाल नहीं पूछा था, वे भी अचानक मेरे उज्ज्वल भविष्य को लेकर चिंतित हो गए।
किसी ने कहा—"पार्टी कब है?" किसी ने कहा—अब तो सरकारी आदमी हो गए। किसी ने कहा—"हमरा लड़का के भी नौकरी लगवा दीजिएगा।"
मैं भी भावनाओं में बह गया। पांच हजार रुपये कर्जा लेकर पार्टी दे डाली। चिकन कटा, मटन कटा, मिठाई बंटी, कोल्ड ड्रिंक बहा। लोगों ने पेट भरकर खाया और मुझे भविष्य का महान शिक्षक घोषित कर दिया। लेकिन उसके बाद जो हुआ, वह भारतीय प्रशासनिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से नहीं, बल्कि लाल स्याही से लिखा जाएगा। प्रमाण-पत्र सत्यापित हुआ। उम्मीद सत्यापित हुई। सपने सत्यापित हुए। रिश्तेदारों की भूख सत्यापित हुई। लेकिन नियुक्ति पत्र सत्यापित नहीं हुआ।अब मेरी स्थिति उस दूल्हे जैसी है जो घोड़ी पर बैठकर बारात लेकर पहुंच जाए और मंडप में जाकर पता चले कि लड़की अपनी प्रेमी के साथ भाग गई।
गांव वाले पूछते हैं—का हुआ नौकरी का?
मैं मुस्कुराकर कहता हूं—प्रक्रिया चल रही है।
अब यह प्रक्रिया इतनी लंबी हो गई है कि लगता है मेरे पोते भी यही जवाब देंगे—"प्रक्रिया चल रही है।"
उधर मेरे एक मित्र पहले अनुबंध वाली नौकरी के परिणाम आने पर कार्यालय में क्रांति कर दिए थे। बाबू को भ्रष्टाचार का प्रतीक बताते थे। मेज थपथपाते थे। व्यवस्था को कोसते थे। ऐसा भाषण देते थे कि भगत सिंह भी सुन लेते तो सदस्यता मांग लेते।
लेकिन कुछ महीनों बाद वही मित्र पुनः उसी कार्यालय में नौकरी करते दिखाई दिए।
जिस बाबू को पहले "व्यवस्था का दलाल" कहते थे, अब उसे देखते ही दोनों हाथ जोड़कर कहते हैं "प्रणाम सर।"
जिस टेबल को अन्याय का अड्डा बताते थे, उसी टेबल पर फाइल रखकर कहते हैं—"सर, कृपा दृष्टि बनाए रखिएगा।"
जिस कुर्सी को भ्रष्टाचार की जननी कहते थे, अब उसी कुर्सी के सामने खड़े होकर मुस्कुरा रहे हैं।
तब समझ में आया कि क्रांति और नौकरी की कुश्ती में हर बार नौकरी ही जीतती है।
पूरी नियुक्ति प्रक्रिया देखकर लगता है कि यह कोई सरकारी चयन नहीं, बल्कि देश का सबसे बड़ा रियलिटी शो है।
पहला राउंड ऑनलाइन आवेदन, दूसरा राउंड दस्तावेज जांच।
तीसरा राउंड परीक्षा
चौथा राउंड परिणाम,
पांचवां राउंड—कोर्ट केस, छठा राउंड नियुक्ति पत्र, सातवां राउंड मानदेय की प्रतीक्षा, और फाइनल राउंड में अभ्यर्थी स्वयं बाहर हो जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि शिक्षक देश का भविष्य बनाता है, लेकिन अपनी नियुक्ति में उसका अपना भविष्य ही दांव पर लगा रहता है। जिस युवक ने जवानी किताबों में झोंक दी, जिसने खेत बेचकर फॉर्म भरा, जिसने मां के गहने गिरवी रखकर कोचिंग की, जिसने रिश्तेदारों के ताने और पड़ोसियों की सलाह दोनों झेली, आज वही युवक सूची, सत्यापन, आपत्ति, संशोधन और न्यायालय की तारीखों के बीच झूल रहा है।सरकार कहती है शिक्षक राष्ट्र निर्माता है। बिल्कुल सही कहती है। लेकिन राष्ट्र निर्माता बनने से पहले उसे भूख सहना सिखाया जाता है। उसे धैर्य सिखाया जाता है। उसे अपमान सहना सिखाया जाता है। उसे आश्वासनों पर जीवित रहना सिखाया जाता है। मानो नियुक्ति से पहले ही पूरा प्रशिक्षण दिया जा रहा हो। हंसने वाली बात यह है कि शिक्षक बनने से पहले आदमी संत बन जाता है। और दुख की बात यह है कि जिस देश का भविष्य कक्षा में बैठा है, उस भविष्य को गढ़ने वाले लोग आज भी नियुक्ति पत्र, मानदेय और आश्वासन के बीच अपनी उम्र खर्च कर रहे हैं। कभी-कभी लगता है कि शिक्षक की नियुक्ति नहीं हो रही, उम्मीदों की परीक्षा हो रही है।
और इस परीक्षा में सबसे अधिक अंक उन्हीं को मिलते हैं, जो हर बार टूटने के बाद भी अगली सूची का इंतजार करते रहते हैं।क्योंकि इस देश का बेरोजगार युवा एक अजीब जीव है—वह हारता है, फिर फॉर्म भरता है। फॉर्म भरता है, फिर सपना देखता है। सपना देखता है, फिर टूटता है। टूटता है, फिर उम्मीद करता है। और शायद इसी उम्मीद के भरोसे यह पूरा तंत्र आज भी चल रहा है। बस सरकार अपनी नियुक्ति खुद करती है, मानदेय अपना बढ़ाता रहे, बाकी जिंदाबाद जिंदाबाद करने लिए हमको तो छोड़ ही रखा है।
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