| ब्लॉग प्रेषक: | राजीव भारद्वाज |
| पद/पेशा: | व्यंग्यकार |
| प्रेषण दिनांक: | 22-05-2026 |
| उम्र: | 40 |
| पता: | गढ़वा झारखंड |
| मोबाइल नंबर: | 9006726655 |
कॉकरोच पार्टी जिंदाबाद।
बक मर्दे, जिस देश में देश की महिलाओं का सबसे बड़ा दुश्मन कोकरोच होता है, उसी देश में चार दिन से कोकरोच देश बदलने की बात कर रहे हैं। बाप का चार चप्पल तुम्हारा सारा भूत उतार देगा गंदे कोकरोच। तुम वही कोकरोच हो न रे, जो रेल के शौचालय में आपन एक्स गर्लफ्रेंड के मोबाइल नंबर लिख के आते हो, वेलेंटाइन डे पर बजरंग दल के सदस्यों से कुटाते हो, फेसबुक और इंस्टा पर महिलाओं को अश्लील मैसेज भेजते हो। साले कोकरोच तुम्हारे लिए तो हमारे घर की माता और बहन ही काफी है, तुम और मच्छर हर दिन बेमौत मरते हो। सुधर जाओ, ये हिंदुस्तान है। नेपाल बांग्लादेश और श्रीलंका नहीं। इस देश में मर्यादा है, विदेश से कोई एक नामुराद हमलोग को नचा नहीं सकता है। बहरहाल,देश में आजकल कोकरोच लोग बड़ा राष्ट्रवादी हो गया है।रात होते ही रसोईघर से निकलकर अइसन मार्च करता है, मानो संसद का विशेष सत्र चल रहा हो। एगो कोकरोच दाल के भगोना पर चढ़के भाषण दे रहा था—“साथियों! देश संकट में है। जनता चुप है, गैस महंगी है, लेकिन बचा हुआ भात अब भी सुरक्षित है… हमला करो!” ई सुनते ही पूरा कुनबा “जय बचल-खुचल भोजन” का नारा लगाते हुए सिंक के रास्ता निकल पड़ा। अब हालत ई है कि आदमी अपना घर में कम, कोकरोच के लोकतंत्र में ज़्यादा रह रहा है। रसोई खोलिए त लगता है जैसे चुनाव आयोग ने वहीं बूथ बना दिया हो। एक कोकरोच चम्मच पर बैठा था, दूसरा तेल के डिब्बा में तैर रहा था, तीसरा पंखा के नीचे ध्यान मुद्रा में बैठा था—जैसे देश के भविष्य पर चिंतन कर रहा हो। जनता भी कम अजीब नहीं है। दिन भर देश बचाने का पोस्ट डालती है, रात में बिस्कुट खुला छोड़कर सो जाती है। फिर सुबह चिल्लाती है—“अरे ई कोकरोच कहाँ से आ गया?” जैसे कोकरोच वीज़ा लगवाकर दुबई से आया हो! हमरे मोहल्ला में एक चाचा हैं। देशभक्ति अइसन कि टीवी पर डिबेट देखते-देखते खुदे एंकर बन जाते हैं। लेकिन घर में कोकरोच देखकर अइसन भागते हैं, मानो सीमा पर दुश्मन घुस आया हो। एक दिन चाची झाड़ू लेकर बोलीं—“देश बाद में बचाइएगा, पहिले ई फ्रिज के पीछे वाला आतंकवादी हटाइए!” चाचा तुरंत राष्ट्रहित में बाहर निकल गए।अब कोकरोच भी बड़ा चालाक हो गया है।पहिले सिर्फ रसोई तक सीमित था, अब ड्राइंग रूम में भी लोकतंत्र फैला रहा है। टीवी के ऊपर बैठकर समाचार सुनता है। नेता लोग जब बोलता है—“देश बदल रहा है”—त कोकरोच भी मूंछ ऐंठकर कहता है—“हाँ, हमरो इलाका बढ़ रहा है।” देश में असली आत्मनिर्भर अगर कोई है, त ई कोकरोच है। ना रोजगार मांगता है, ना आरक्षण, ना बिजली बिल देता है। ऊ सिर्फ अंधेरा खोजता है और वहीं सरकार बना लेता है। जनता का हाल भी कम मजेदार नहीं। सड़क टूटा रहे, नाली जाम रहे, मच्छर हेलीकॉप्टर की तरह मंडराए—सब सह लेगी। लेकिन अगर मोबाइल का इंटरनेट पाँच मिनट बंद हो जाए त पूरा लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। आज का नागरिक बड़ा जागरूक है। देश पर घंटों बहस करेगा, संविधान पर ज्ञान देगा, लेकिन घर के डस्टबिन का ढक्कन बंद नहीं करेगा। फिर कोकरोच परिवार समेत आकर बोलेगा— “धन्यवाद! आपन सहयोग से हम विकसित राष्ट्र बन गए।” सच पूछिए त देश और कोकरोच में बहुत समानता है। दोनों जगह जनता हमेशा पिसती है। ऊपर वाला मलाई खाता है, नीचे वाला अंधेरा खोजता है, और बीच में आम आदमी चप्पल लेकर भागता रहता है। अंत में बस एतने कहेंगे—देश को बदलना है त पहिले रसोई साफ रखिए। काहे कि लोकतंत्र और कोकरोच— दूनो गंदगी में बहुत तेजी से बढ़ते हैं!
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