हाय रे बस (यात्रा संस्मरण)

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ब्लॉग प्रेषक: राजीव भारद्वाज
पद/पेशा: व्यंग्यकार
प्रेषण दिनांक: 06-06-2026
उम्र: 40
पता: गढ़वा
मोबाइल नंबर: 9006726655

हाय रे बस (यात्रा संस्मरण)

जीवन में कुछ यात्राएँ आदमी को अनुभव देती हैं, कुछ ज्ञान देती हैं और कुछ ऐसी होती हैं जो हड्डियों की गिनती दोबारा करा देती हैं। करेजा करड़ करड़ करे लगता है।डाल्टनगंज से औरंगाबाद की मेरी बस यात्रा तीसरी श्रेणी में आती है।  ड्यूटी से गिरते हांफते बस स्टैंड पहुँचा, वहाँ एक बस खड़ी थी। बस क्या थी, लोहे की ऐसी विरासत थी जिसे देखकर पुरातत्व विभाग भी श्रद्धा से नमन कर दे, और संग्रहालय को सौंप दें, उसके ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—"नॉन-स्टॉप सुपरफास्ट एक्सप्रेस"। इतने बड़े अक्षर में लिखा था कि लगता था बस के मालिक को भी यकीन नहीं था, इसलिए बार-बार लिखवाना पड़ा होगा।हमने सोचा, चलो आज भाग्य मेहरबान है। सीधे औरंगाबाद पहुँच जाएँगे। टिकट लिया और सीट पर बैठ गए। सीट ऐसी थी कि उस पर बैठते ही लगा जैसे कोई बूढ़ पुरणिया खटिया पर अंतिम साँसें गिन रहे हों।बस खुली। खुली नहीं, कुछ भले सवारियों ने गालियों की जय जयकार करवा कर खुलवाई। लेकिन  ठीक पाँच मिनट बाद बस रुक गई। एक यात्री चढ़ा। फिर चली। पाँच मिनट बाद फिर रुक गई। दो यात्री चढ़े। साला हमको सनी लियोनी याद आने लगी, लोग चढ़ते हो जा रहे थे। फिर चली। दस मिनट बाद एक आदमी सड़क किनारे बीड़ी सुलगाते दिख गया। खलासी ने दूर से ही आवाज लगाई— "औरंगाबाद! औरंगाबाद!" वह बोला—"हमको तो हुसैनाबाद जाना है।"खलासी बोला—"कोई बात नहीं, रास्ते में उतार देंगे।" सवारी बाहर से बोला, सीट है ! इतने में ड्राइवर के ब्रेक लगते ही केबिन में खलासी का सीट टूट कर बाहर खड़े सवारी के पास गिर गया, मैने सोचा साला सुविधा हो तो ऐसा की डायरेक्ट सीट ही पैसेंजर के पास।

बस रुक गई।

तब मुझे समझ आया कि इस बस में मंजिल नहीं, संभावनाएँ देखी जाती हैं। और अत्यधिक संभावना के बाद मंजिल मिलना स्वाभाविक है।

हर गाँव में बस रुकती। हर टोले में बस रुकती। एक बार तो ऐसा लगा कि चालक अपने फूफा, मौसा, जीजा से मिलते-मिलाते जा रहा है। एक जगह बस रुकी तो कोई सवारी नहीं मिली।

मैंने पूछा—

"क्यों रुके?"

खलासी सड़लका दांत दिखा कर बोला—

"आदत है।" मन तो किया इस भाऊ श्री वाले को हिएं निपटा दें, लेकिन अनुभव ने यही कहा कि इन सबों का नेटवर्क बड़ी तगड़ा होता है। कहीं हमही न निपट जाएं। इसी बीच एक दुबला-पतला आदमी खिड़की के बाहर से चिल्लाया—"आगे सीट है क्या?" अंदर बैठे एक भाई साहब ने कहा— आइए गोदी में बैठिएगा। उस समय बस में गाना बज रहा था " आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं"। यह भारतीय आशावाद और उम्मीद का सर्वोच्च उदाहरण था।

बस अब इतनी भर चुकी थी कि अगर कोई मच्छर भी अंदर घुसता तो उसे रिजर्वेशन करवाना पड़ता।

तभी इतिहास का वह क्षण आया जिसके लिए शायद पूरी बस बनी थी। एक भाई साहब अपनी सीट पर बैठकर आपन मेहरारू से बात करने में व्यस्त थे। सीट वर्षों से सरकारी पुल की तरह विश्वास पर टिकी हुई थी।

अचानक चर्रर्र...फिर खटर्रर...फिर धड़ाम!


पूरी सीट आदमी मेहरारू सहित उखड़कर पीछे बैठे यात्री की गोद में जा गिरी। यात्री घबराकर चिल्लाया—

"अरे! ई का गिरा?"

दूसरा बोला—

"सरकारी योजना होगी।" मैने सोचा योजना बड़ी गुदगर है, पता नहीं मुझे सरकारी योजना से वंचित क्यों रखा जाता है।

आदमी जमीन पर पड़ा मुस्कुरा रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो। दांत निपोरकर बोला—

"सीट थोड़ी कमजोर थी।" हम बोले साला

"कमजोर सीट नहीं थी, बूढ़ी सीट थी।"

लेकिन अभी तो ट्रेलर चल रहा था।

मेरे सामने एक सज्जन बैठे थे जिनका पैर कुछ महीने पहले टूटा था। उसी दिन डॉक्टर ने प्लास्टर काटा था।

वे बार-बार पैर सहला रहे थे। कह रहे थे—

"अब भगवान की कृपा से सब ठीक है।"

भगवान शायद उस दिन बस में ही बैठे थे और मनोरंजन कर रहे थे।

एक विशालकाय गड्ढा आया। डलावर साहब ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की। शायद पुरानी दोस्ती रही होगी। बस गड्ढे में चिहुंक के घुसा।

पूरी बस हवा में उछली।

सामने के केबिन का शीशा हिला। और धड़ाम से निकलकर उसी आदमी के उसी पैर पर आ गिरा जिसका प्लास्टर बेचारा कटवा कर आ रहा था। सज्जन की ऐसी चीख निकली कि आसपास के सीट पर बैठे लोगों ने समझा भूकंप आ गया।

कुछ देर बाद बेचारे ने अपना पैर देखा और फिर ड्राइवर साहब को देखा। उधर ड्राइवर साहब ने चालक का पैर देखा और फिर सड़क को देखा। सड़क ने गड्ढे को देखा। सब अंदर ही अंदर एक दूसरे की मां बहन को याद कर रहे थे। और गड्ढा अलगे मुस्कुरा रहा था। आखिर में पता चला कि उन सज्जन का पैर फिर से टूट गया। सज्जन ने अविलंब निर्णय लिया—

"अब हम औरंगाबाद नहीं जाएँगे।" डॉक्टर का पर्ची पूरे बीस दिन मान्य है।

बेचारे ने उसी बस से वापसी का टिकट कटवा लिया। मैंने पूछा "फिर इसी बस से?"

वो बोले—

"जिसने नुकसान किया है, वही मुआवजा देगा। कम से कम अस्पताल तक तो छोड़ देगा।" हम सोचे कि डाक्टर दवा दुकान के कमीशन से खुश नहीं है का जो बस के स्टाफ से भी कमीशन लेने का गुप्त योजना बनाया है।


"डॉक्टर साहब हमको कमीशन देते हैं।"

आगे बढ़े तो एक जगह बस का दरवाजा बंद नहीं हुआ।

खलासी रस्सी से बाँधने लगा। रस्सी छोटी पड़ गई। दूसरी रस्सी आई।

वह भी छोटी पड़ गई।

आखिर एक यात्री का गमछा लेकर दरवाजा बाँधा गया। यात्री बोला—"गमछा वापस मिलेगा न?" खलासी बोला—


"अगर दरवाजा नहीं गिरा तो मिल जाएगा नहीं तो आप दानवीर कर्ण अब कहां बचे हैं दुनिया में। बस में बैठे लोगों ने गमछे के उज्ज्वल भविष्य के लिए दो मिनट का मौन रखा। एक बुजुर्ग यात्री पूरी यात्रा में भगवान का नाम जप रहे थे। मैंने पूछा— "बाबा, इतनी भक्ति कब से?"

वो बोले— "भक्ति नहीं बेटा, सुरक्षा कवच है।"

दूसरे यात्री ने कहा—

हम हैं भगवान पासवान,  सरवा बीस रूपये कम का दिए की दस जगह बस रुकवा रुकवा कर उतारने की धमकी देता था।अधरतिया के औरंगाबाद पहुंचा।

बस से उतरे तो ऐसा लगा जैसे शरीर का हर पुर्जा अलग-अलग पंचायत प्रतिनिधि  बनाकर विरोध प्रदर्शन कर रहा हो। घुटना अलग दुख रहा था ,कमर अलग। गर्दन अलग। आत्मा सबसे ज्यादा। उतरते समय मैंने फिर उस बोर्ड को देखा—'नॉन-स्टॉप सुपरफास्ट एक्सप्रेस'

इस देश में कुछ चीजें केवल लिखने के लिए होती हैं। जैसे सरकारी दफ्तर में "जनता का सेवा हमारा धर्म है।" अस्पताल में "दवा मुफ्त है।" चुनाव के बाद "विकास होगा।"

और बसों में "नॉन-स्टॉप एक्सप्रेस।"

उस दिन समझ आया कि यह बस यातायात का साधन नहीं थी। यह लोकतंत्र की चलती-फिरती प्रतिकृति थी—शोर बहुत, वादे बड़े-बड़े, हालत खस्ताहाल और मंजिल तक पहुँच जाना ही सबसे बड़ी उपलब्धि।

डाल्टनगंज से औरंगाबाद की वह यात्रा आज भी याद आती है, साथ ही पुरवइया बहे तो याद आता देह का दरद।

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