| ब्लॉग प्रेषक: | राजीव भारद्वाज |
| पद/पेशा: | व्यंग्यकार |
| प्रेषण दिनांक: | 20-05-2026 |
| उम्र: | 40 |
| पता: | Nawada |
| मोबाइल नंबर: | 9006726655 |
ऑनलाइन दुकानदारी
अरे भाई साहब! ई का तमाशा चल रहा है।
गांव के लोग अभी सुगा-मैना नियर "ऑनलाईन-ऑनलाईन" रटिए रहे थे कि शहर के दवा दुकान वाले भाई लोग सीधे शटर गिरा के हड़ताल पर बैठ गए! ई तो वही बात भइल कि लइका जनमल ना, आ मुंडन के तैयारी शुरू।
शहर वाले कह रहे हैं कि ऑनलाईन दवाई मंगवाओ, मोबाइल पर छूते ही दवा घर आ जाएगी। अरे भैया, हमारे गांव में "नेटवर्क" पकड़ने के लिए तो पहले गाछ पर चढ़ना पड़ता है,
अब मानिए किसी को पेट झरी लगा है। वो बेचारा नेटवर्क की खोज में बबूल के पेड़ पर चढ़ेगा, कि नीचे बैठ के ऑर्डर कैंसिल होने का इंतजार करेगा? जब तक ऑनलाईन वाला 'ओटीपी' भेजेगा, तब तक तो मरीज का 'कल्याण' हो जाएगा।
असली दर्द तो हमारे गांव के झोलाछाप... सॉरी, "रजिस्ट्रार" डॉक्टर साहब को है। वो जो लोकल दवा दुकान वाले हैं न, वो खाली दवा नहीं बेचते हैं। वो आधा डागदर खुद होते हैं।
हम लोग दुकान पर जा के बोलते हैं—"ए कन्हाई भाई, पेटवा में गुरगुर-गुरगुर कर रहा है, कौनों बढ़िया कैपसूल दे दो। कन्हाई भाई तुरंत दू गो लाल-पीला गोली निकाल के दे देते हैं। काम चकाचक!
अब बगेसर भाई दुकान बंद कर के धरने पर बैठ गए हैं। ऑनलाईन वाला से पूछिए कि पेटवा गुरगुर कर रहा है, कौन दवा दें? तो वो ससुर कम्प्यूटर में से झांक के पूछेगा—"प्रिस्क्रिप्शन (पुर्जा) अपलोड करो!" अरे भाई, पुर्जा रहता तो हम बगेसर भाई के पास काहे आते?
दवा दुकान वाले डर रहे हैं कि ऑनलाईन कंपनियां उनका धंधा खा जाएंगी। अरे भाई, प्योर उधार का व्यवस्था है का ऑनलाइन में।
"अगला महीना धान कटेगा त दे देंगे भाई जी!" (प्योर उधार) । एक बात और रिश्ते की पहचान भी तो है बगेसर भाई की दुकान में। ऑनलाइन वाला कहां रिश्तेदारी समझता है।
"अरे भौजी के तबियत खराब है? ई गोली खिलाओ, एकदम हरिअर हो जाएगी!"।
वियाग्रा और टाइटेनिक टू के नियमित सेवन वाला के ज्यादा दिक्कत है, उसके लिए ऑनलाइन बहुत रिस्की है, साला अनुपस्थिति में बाबूजी के हाथ लग गया तो जायदाद का दो भाग होने की संभावना बनी रहेगी।
अरे भाई शटर उठा लो, कॉन्डम नियमित वाला चीज है, नहीं तो तुम्हारा दो दिन का बंदी कहीं हिंदुस्तान की आबादी 200 करोड़ न पहुंचा दें। और यदि तुम्हारा यही रवैया रहा तो तुम सिर्फ कॉन्डम बेचने लायक ही रहोगे।
दुकानदार भाई लोग कह रहे हैं—"ऑनलाईन दवा बेचना बंद करो, नहीं तो हम अनिश्चितकालीन हड़ताल पर रहेंगे!"
अरे मालिक! आपके हड़ताल से ऑनलाईन वाले को का घाटा होगा? वो तो एसी रूम में बैठ के की-बोर्ड टीप रहा है। आ यहां तबाही हमनी के है। कल मंगरू को सर्दी हुआ, तो दुकान बंद देख के वो काढ़ा पी लिया। अब वो कह रहा है—"हड़ताल साल भर रहे भाई, काढ़ा से गैस एकदम ठीक हो गया, कौनों पैसे नहीं लगा!" देख लीजिए, ज्यादा हड़ताल रखिएगा त लोग जड़ी-बूटी पर उतर आएगा, फिर ऑनलाईन और ऑफलाईन दोनों का डिब्बा गोल हो जाएगा!
अब त लोग भी कह रहा है, ऑनलाईन के चक्कर में ऑन-द-स्पॉट मत हो जाना भाई!
इसलिए ऐ दवा दुकान वाले भाई लोग! शटर उठाइए और दुकान खोलिए। ई ऑनलाईन-फोनलाईन हवा-हवाई है। जब तक हमन के यहां 'उधार' का सिस्टम जिंदा है, तब तक कोई अमेज़न और फ्लिपकार्ट आपका बाल बांका नहीं कर सकता। जो मजा पुर्जा देख के बगेसर भाई के माथा खुजलाने में है, वो मोबाइल के 'टच स्क्रीन' में कहां!
दुकान वाला भी आएं के बाएं दाम लेता है जी, 36 रुपया के दवाई के 256 रुपया लेता है। कम करने पर 6 रुपया छोड़ देता है, ऊपर से ऐसन अहसान जताता है लगता है 10 कट्टा भूमि दान कर दिया हो। समय सबका आता है, समय सबका जाता है। इसलिए अच्छे समय का कद्र कीजिए। तोर हड़ताल से सिस्टम नहीं बदलेगा। तुमको बदलना पड़ेगा, समय की यही मांग है, इसको अपनाना पड़ेगा।
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