| ब्लॉग प्रेषक: | डॉ. अभिषेक कुमार |
| पद/पेशा: | साहित्यकार व विचारक |
| प्रेषण दिनांक: | 30-12-2025 |
| उम्र: | 36 |
| पता: | ठेकमा, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश |
| मोबाइल नंबर: | 9472351693 |
बिकने की भी हद हो गई, सुना है अरावली बिकने वाली है..!
बिकने की भी हद हो गई, सुना है अरावली बिकने वाली है..!
~ डॉ. अभिषेक कुमार
बिकने की भी हद हो गई.. पहले रेल, सेल, भेल, स्टेशन, एयरपोर्ट, सी पोर्ट, बिजली संयत्र, कल कारखाने, खाद्यान्य, खनन पट्टी, सरकारी सार्वजनिक परिसंपत्तियां बिकता था, छोटे मोटे पहाड़ अपने कारपोरेट मित्रों को बेच देते थे चलो कोई बात नहीं..! पूर्वजों ने संपत्ति अर्जित की थी अथवा विरासत में मिली तो बेच दिया। अब यह क्या सुन रहा हूं कि अरावली पर्वत माला जो साढ़े छः सौ किलोमीटर लंबी सबसे पुरानी प्रकृति धरोहर है उसे बेचने की तैयारी की जा रही है..? यह क्या पागलपनई समाई है जो समझ से परे है। आपको पता है कि इसके खंडन के क्या दुष्परिणाम होंगे..? मुझे पता है वो 20 साल से अधिक जीने वाले नहीं हैं और 20 साल में इसके दुष्परिणाम उतना भयंकर शायद न दिखे पर आपको पता है की 20 साल बाद अरावली पर्वत माला को छत विक्षत करने के पश्चात क्या परिणाम आपके वंशजों का क्या होगा..? आपके प्यारे देश वासियों, भाई बहनों का क्या हाल होगा..? हे महामानव चंद रुपए पैसों की लालच में प्रकृति के साथ इतना बड़ा खिलवाड़ न करो..! बल्कि थोड़ा GST और बढ़ा लो वह चलेगा पर पहाड़ के परिभाषा को बदल कर उस पर कुठाराघात करने की तैयारी न करो..! अन्यथा इसके परिणाम बड़ा भयंकर होने वाला है।
जो ढाई करोड़ साल से गुजरात के पालमपुर से राजस्थान, हरियाणा होते हुए दिल्ली के रायसीना तक मरुस्थल बढ़ने, धूल भरी गर्म आंधियों, चक्रवातों को रोके खड़ा है उसे तुम अरावली मानोगे ही नहीं..? यह क्या तर्क हुआ, किस आधार पर हुआ कि जो 100 मीटर से कम ऊंचाई है उसे अरावली पहाड़ नहीं मानेंगे..? मतलब साफ है कि नब्बे प्रतिशत अरावली की पहाड़ियां 100 मीटर से कम हैं इस लिए इसके खंडन के वैधानिक स्वीकृति दे दी जाए..? वोट चुरा लिए, राज्यों की सरकारें हड़प लिया जैसा कि लोग कह रहे हैं, देश के तमाम सार्वजनिक परिसंपत्तियों को एक-एक कर के चहते मित्रों के नाम कर दिए मुझे उसका उतना दुःख नहीं है जितना कि अरावली के जमींदोज करने की प्लानिंग पर संताप है। कल कहोगे सबसे जवां, हसीन और खूबसूरत हिमालय पहाड़ को चौतरफा विकास के लिए खंडन करेंगे..? खैर हिमालय को विकास के नाम पर बहुत नुकसान पहुंचाए बेचारा वह कराह रहा है। इसी प्रकार अन्य पर्वत मालाएं जैसे कि काराकोरम, विंध्य, सतपुड़ा, सह्याद्रि, नीलगिरि आदि को विकास के नाम पर खनन हेतु कोई मित्रों को समूचे दान कर दोगे..? वैसे उनकी छाती पत्थर आदि खनिज खनन हेतु बम ब्लास्ट से छलनी हो चुका है। उनके आस पास के वातावरण में जल त्रासदी, विषैले वातावरण और उस पर निवास करने वाले जीव जंतुओं का आशियाना उजाड़ चुके हो...! फिर कहोगे हिंद महासागर, अरब सागर के अपना क्षेत्र, बंगाल के खाड़ी बेच देंगे..!
आखिर यह हो क्या रहा है इस देश में..? जंगल के जंगल उजाड़ कर, हजारों लाखों पेड़ उखाड़ कर मित्रों को दे दिए बिजली संयत्र स्थापित करने हेतु चलो कोई बात नहीं पर अब बड़ी से बड़ी प्राचीन पर्वत मालाओं के उखाड़ने पर तुले हो... यह समझदारी है आपको की क्या करने जा रहे हो..?
यदि विकास की होड़ में बहुत आगे बढ़ना चाहते हो तो सीखो न दुबई, सऊदी अरब आदि देशों से जिन्होंने मरुस्थली बालू ही बालू भूमि को स्वर्ग जैसा सुंदर बना दिया। आज लोग दुबई देखना गर्व समझते हैं। भारत भूमि के इतने सुंदर जल, थल, नभ, उपवन, प्राकृतिक सुंदर छटा को बर्बाद करने, बेचने पर आखिर क्यों तुले हो..? विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मरुस्थल राजस्थान के थार इलाके को करो न सुपुर्द अपने मित्रों की वह मरुभूमि को गुलजार करें..! जो पशु पक्षी के घर उजाड़ते हुए जंगल के लाखों पेड़ काट कर कंपनियां स्थापित कर रही वह क्यों नहीं इस थार के इलाके में लाखों पेड़ लगा कर एक भी कंपनियां स्थापित कर रही है..? मतलब हम पेड़ काटेंगे, पेड़ लगाएंगे नहीं..? अरे प्रकृति पर्यावरण के दोहन करने वाले न खुद बचोगे न दूसरों बचने लायक छोड़ोगे..! आज बंदर, हिरन, तेंदुआ, लोमड़ी, हाथी आदि कई पशु जंगल छोड़ शहर, गांवों की तरफ भाग रहे हैं। आवेश में आम गरीब परिवारो पर टूट रहे हैं उन्हें मौत के घाट उतार रहे हैं। क्योंकि उनका घर तुम्हारे चहेते कंपनियों, ठीकेदारों ने तबाह किया है। बुलडोजर की दादागिरी और डायनामाइट के तेज आवाज ने जंगली जानवरों, पशु पक्षियों के जीना बेहाल कर दिया है। आस पास के घरों में दीवारें खिसका दी है। देश के कई राज्यों में आदिवासी, वनवासी व स्थानीय जन समुदाय अपनी मातृभूमि, जल, जंगल, जमीन बचाने की जद्दोजेहद कर रहे हैं पर उनकी एक न सुनी जा रही। यदि वे अपनी आंदोलन ज्यादा तेज व उग्र करेंगे तो दुबारा जलियांवाला बाग भी हो सकता है, इसलिए वे शांति प्रदर्शन कर रहे हैं परंतु उनकी एक न सुनी जा रही और एकड़ की एकड़ भूमि कारपोरेट मित्रों एक रुपए दो रुपए में दान की जा रही है। विकास के नाम पर ऐसा महाविनाश इससे पहले कभी नहीं देखा गया न देखा जाएगा।
प्रकृति ने मैदानी भागों में छोटे-मोटे पहाड़, बालू वाली नदियां इसी लिए दिए हैं कि उसे खनन कर उसे जैसे उपयोग करना है कर लो..! कोई दिक्कत नहीं। पर अरावली पर्वत श्रृंखला सहित आठ दस और अन्य पर्वत मालाएं जो भारतीय सभ्यता संस्कृति फलने फूलने के मजबूत धरोहर और स्तंभ है उसे बर्बाद न करो हे सर्व सामर्थ्य महापुरुष।
आखिर अरावली का क्या अपराध है.. जरा आप सोच के बताओ..
क्या वह चंदा नहीं देती थी..? क्या वह वोट बैंक नहीं बनती थी..? न किसी चहेते कंपनी के बोर्ड में बैठती थी..? बस सदियों से खड़ी थी, रेत को रोकती थी, वर्षा के पानी को सहेजती थी, भूजल स्तर को रिचार्ज करती थी, हवा को साफ़ करती थी क्या यही उसका सबसे बड़ा गुनाह था..?
क्या ठान ही लिए हो कि हमारे समय में जो खड़ा रहेगा, वह या तो विरोधी होगा या फिर विकास में बाधक होगा। उस बाधा को ऐन केन प्रकारेन मिटा दोगे या उस बाधा को हटा नहीं सकते तो परिभाषा ही बदल दोगे..?
किस सिद्धांत पर यह सिद्ध हुआ कि हर ऊँचाई पहाड़ नहीं होती..!
100 मीटर से कम के थ्योरी जो किसी ऊंचास को पहाड़ सिद्ध नहीं करती वह कहां से आई..? यह भूगोल नहीं,
एक “कानूनी चूक” की अवधारणा है। कुदरत को अब मीटर-टेप से मापा जाएगा, और न्याय तराज़ू से नहीं, ड्राफ्टिंग स्केल से मापी जाएगी इस देश में..?
शासन सत्ता सत्ता में बैठे महामानव का विचार कितना मनमोहक है...
“देखो, कानून तो हमने नहीं तोड़ा, हमने बस पहाड़ की परिभाषा बदली है।” न्यायालय ने फाइल पलटी..“अगर काग़ज़ कहता है कि पहाड़ नहीं है, तो पहाड़ की ज़िद क्यों?”
और लाभान्वित होने वाली कंपनियों का मनन -चिंतन कितना सुंदर है...
“हमें पहाड़ से क्या लेना देना, हमें तो सिर्फ़ ज़मीन चाहिए सीधी, साफ़ और क्लीयरेंस वाली ताकि मनमौजी खनन/निर्माण हो सके।”
अब सवाल यह नहीं कि अरावली पर्वत माला क्यों दूसरे के हाथ बेचने, खनन कराने योग्य स्थिति बनाई जा रही है..!
सवाल यह है कि इतने साल यह बची कैसे रही..? किसने इसे इतनी देर तक संरक्षित रखा और विकास से दूर रखा..?
कर लो मनमानी... मुझे पता है आपके सामने बहुत देर तक कोई लोहा लेने वाला इस भारत भूमि पर फिलहाल नहीं है। अरावली नहीं रही तो क्या होगा बस उतना ध्यान में रखना..
रेगिस्तान बढ़ेगा तो, एसी बिकेंगे। पानी समाप्त होगा तो टैंकर चलेंगे। हवा जहरीली होगी तो मास्क का बाज़ार खुलेगा।
और हर साल हम कहेंगे- “इस बार प्रकृति कुछ ज़्यादा ही नाराज़ है और दिन प्रतिदिन निष्ठुर होती चली जा रही है।”
हम बड़ा समाधानशील राष्ट्र बनते जा रहे हैं। जंगल कटेंगे तो
पर्यावरण दिवस पर भाषण बढ़ेंगे। पहाड़ गिरेंगे तो ग्रीन समिट के पोस्टर छपेंगे, और जो बच जाएगा, उसे अगले संशोधन में
“अन्य” घोषित कर दिया जाएगा। अरावली आज अभी सुरक्षित खड़ी है- बस अब पहाड़ नहीं मानी जाएगी..! और जिसे माना न जाए, उसे बचाने की ज़िम्मेदारी भी नहीं होती। वे लोग शायद मूर्ख थे जो पूरे अरावली पर्वत श्रेणी के इर्द गिर्द भी खनन पर मजबूत प्रतिबंध लगाएं थे और इसे बचाने का कानून बनाए थे। कोई बात नहीं उसका परिभाषा बदल दिए हो तो जो बुझाए सो करो पतंग के डोर तुम्हारे ही हाथ में है।
मेरे प्यारे देशवासियों लोकतांत्रिक विकास का नया नमूना अनुभव करो जहाँ प्रकृति रहे, पर सिर्फ़ काग़ज़ों में। तुम जात पात धर्म संप्रदाय के ऊंच नीच भेद भाव, भ्रम में उलझे रहो हम विकास के असल परिभाषा अपने स्वार्थ के अनुसार बदलते रहेंगे।
सीख बस इतनी है:
जब सत्ता, न्याय और पूँजी एक ही भाषा बोलने लगी तो समझ लो उस देश का जनता इनके हाथों का कठपुतली बन चुकी है। अब इन्हीं के हवाले वतन साथियों..! आप देव तुल्य जनता जनार्दन किसी जनसभा के भीड़ की शोभा बनो, ताली बजाओ, नारा लगाओ आखिर इसके सिवा कर ही क्या सकते हो..!
आज कुदरत को चुप कराया जा रहा है, कल तुम्हारी जमीनें छीन चुप कराई जाएंगी, कैंप में आश्रय भी मिलेगा और पांच सात किलो अनाज भी... सुबह-शाम मन के बात सुनकर ताली, थरिया, लोटा बजाते रहना।
अरावली पर्वत माला को बचाना सिर्फ़ पहाड़ नहीं, भविष्य को बचाने जैसा है। मानव सभ्यता को बचाना है। शासन सत्ता कि मलाई चाटने वाले लोगों की कोई परवाह नहीं उन्हें इसमें फायदा, बिजनस नजर आएगा। खेद तो इस बात की और अधिक है कि अरावली पर्वत माला के समीप जन्मे नेतागण जो सत्ता पक्ष में आसीन है वह भी चुप हैं। लानत हो ऐसी ज़मीर की जो जागे नहीं..!
अब से ऐसी सरकारें चुनो जो गठबंधन की न हो, प्रत्येक पांच वर्ष बाद उसे बदलो अन्यथा लंबे समय तक किसी पार्टी/गठबंधन को सरकार में स्थिर रहने से अघोषित आपातकाल और तानाशाही में कब तब्दील हो जाएगा वह पता ही नहीं चलेगा। इतिहास महामानव की उपाधि बसाने वाले को देती है जल जंगल जमीन उजाड़ने वालों की नहीं..! गगन बेचने वाले को नहीं..! इतिहास में जिन महानुभावों का नाम आदर सम्मान से लिया जाता है वह कुछ न कुछ सृजन किए हैं। विनाश और विध्वंश करने वाले लोग महान कभी नहीं हो सकते चाहे जो तिकड़म लगा लो..
अतः अरावली पर्वत श्रेणियां थार रेगिस्तान की रेत, गर्म हवा और धूल को दीवार की तरह रोककर कवच का काम करती हैं, रेगिस्तान के विस्तार को रोकती है यह उत्तर भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है इसे नष्ट करने की योजना न बनाओ। अरावली के जंगल 37 जिलों में बसे समुदायों के लिए ईंधन, चारा, औषधीय पौधे और पानी का मुख्य स्रोत हैं, लाखों जीव जंतुओं का आश्रय स्थल है। इसे संरक्षित करने पर ध्यान केंद्रित करो न कि कारपोरेट मित्रों के हाथों लुटवाने पर...
जय अरावली, जय भारत माता।
~ डॉ. अभिषेक कुमार
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