| ब्लॉग प्रेषक: | संतोष कुमार |
| पद/पेशा: | प्रबंधक (रा. ग्रा. आजीविका मिशन) |
| प्रेषण दिनांक: | 14-05-2022 |
| उम्र: | 35 |
| पता: | लखनऊ |
| मोबाइल नंबर: | 9919988236 |
आस
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जीवन, क्या इसे समझा जा सकता है, हर क्षण एक नयी आस के साथ जीवन का चक्र चलता रहता है। एक आस की पूर्ति होती है तो मन में दूसरी आस घर कर जाती है, तथा दूसरी आस की पूर्ति होती है तो तीसरी आस मन में घर कर जाती है। इसी तरह हम देखते हैं कि इच्छाऒ का कभी अन्त नहीं होता है। एक इच्छा की पूर्ति के पश्चात् दूसरी इच्छा का बीज स्वत: ही पड़ जाता है।
आस-पास के वृद्धजनों को देखकर और उनके कष्टों को महशूस कर युवा वर्ग यह निष्कर्ष निकालतें है कि जीवन में कभी बुढ़ापा न देखने को मिले, तो सही है। इसी भावनावेष में बहकर वो ये भूल जाते हैं कि जीवन का समयचक्र कभी रुकता नही है। मुट्ठी में भरी रेत की तरह धीरे-धीरे खिसकता चला जाता है और उन्हे यह पता भी नही चल पाता कि जो भावना हम वृद्धजनों को देखकर व्यक्त करते थे आज हमारा उसी अवस्था से साक्षात्कार हो रहा है।
फिलहाल युवा वर्ग का ऐसा सोचनें का एक कारण भी है। उन युवा वर्ग को आगे जाननें और सीखनें, समझनें की इच्छा रहती है। मनुष्य को आगे जाननें और सीखनें की इच्छा तभी रहती है जब वह पिछली बातों को भूलता जाता है। कहनें का मतलब है कि एकदम से नहीं भूलता, वो पिछली बातें उसके मस्तिष्क में रहती हैं जिन बातों को वो आत्मसात किया होता है। और समय-समय पर वो बातें याद भी आती हैं।
उदाहरण के लिए हम यह कह सकते हैं कि 'जब हम कोई पुस्तक पढ़ते हैं तो उस पुस्तक में लिखी बातों को समझनें का प्रयास करते हैं और उसे समझने के लिए हम अपनें मस्तिष्क को पुस्तक में लिखी बातों पर केन्द्रित करते हैं, तब आपनें यह महशूस किया होगा कि जब हम किसी बात को समझनें के लिए मस्तिष्क को केन्द्रित करते हैं तो उस क्षण मस्तिष्क में केवल उसी बात को समझनें का मंथन चलता है, जिस बात को हम समझना चाहते है। इसके अलावा मस्तिष्क में और कोई विचार नही आता तथा उस समय केन्द्रित मस्तिष्क में और कोई बात याद नही आती बात को समझनें का मंथन चलता रहता है और हम उस बात को समझ लेते हैं अर्थात एक नये विचार को सीख लेते हैं। बस इसी क्षण को कहा गया है कि
"नयी चीज सीखनें के लिए पुरानीं बातों को भूलना जरूरी होता है।"
दूसरे उदाहरण के रूप में हम गणित को ले सकते हैं। जब हम गणित का कोई प्रस्न हल कर रहे होते है तो प्रस्न से सम्बन्धित फार्मूला ही हमें याद आता है इसके अतिरिक्त अन्य फार्मूले पर हमारा ध्यान नहीं जाता है तथा हमें वही फर्मूला याद आता है जो प्रस्न से सम्बन्धित होता है। परिणामस्वरूप हम प्रस्न को
हल कर लेते है। बाकी फार्मूले भी याद रहते हैं लेकिन जरूरत पड़नें पर वह याद आते हैं।
कहनें का तात्पर्य यह है कि हमारे द्वारा समझी हुई बातें मस्तिष्क में भण्डारित रहती हैं और समय-समय पर जरूरत पड़नें पर हमें याद आती हैं और जब हम कोई नया विचार सीखते हैं तो उसके अतिरिक्त और कोई अन्य विचार हमारे मस्तिष्क में नहीं आता।
हालांकि सीखने की कोई उम्र नहीं होती मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक सीखता ही रहता है। किन्तु एक ऐसा समय आता है जब उसे लगता है कि उसकी सभी जिज्ञासाएं एक सीमित स्तर तक पहुंच चुकी हैं तो वो सभी पुरानी बातें याद आनें लगती हैं जो बाते उसके अबतक के जीवन में घटित हुई होती हैं। और अपनें आस-पास के लोगों को वो अपनें अनुभव को बताता है और सोचता है कि काश वही समय मेरे जीवन में दुबारा आ जाए ! सामान्यतः यह मनोंदशा वृद्धावस्था में ही आता है और जिसका परिणाम यह होता है कि उसे इस संसार तथा इस जीवन, रिश्ते-नाते सभी से मोह हो जाता है। कलतक यही व्यक्ति युवावस्था में वृद्धावस्था की परिकल्पना नहीं करना चाहता था परन्तु आज वो वृद्धावस्था के अन्तिम चरण पर है और मृत्यु की तरफ प्रगतिशील है, तो उसे उस युवावस्था की सोंच का उत्तर स्वयं ही मिल जाता है कि वृद्धावस्था में जैसे-जैसे मृत्यु की तरफ कदम बढ़ता जाता है जीवन जीनें की इच्छा उतनीं ही प्रबल होती जाती है। यही कारण है कि मृत्युशैय्या पर पड़ा व्यक्ति अपनें परिवार वालों से मिलनें की इच्छा प्रकट करता है और मन ही मन सोचता है कि काश और दिन इनके साथ रह लेता, पता नहीं मृत्यु के बाद क्या होगा, दुबारा इनसे मिल पाऊँगा या नहीं।
यही आस सामान्यतः अन्तिम आस होती है, जिसे वह सामनें वालों से प्रकट नहीं कर पाता और अपनीं आँखें सदा के लिए बंद कर लेता है।
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